सोमवार, 18 दिसंबर 2023

तट


तोड़ते रहे तुम बंदिशें ,

और समेटती रही मैं, 

बारंबार !

की कोशिश जोड़ने की,

कई बार !

पर गई मैं हार ,

हर बार !

समझ गई मैं,

क्यु हूँ  बेकरार !

समेट सकती हूं, 

पर जोड़ नहीं सकती।

जो टूट गया 

सो टूट गया । 

यही  है प्रकृति 

का  सार  ।।

पूनम 🙏🙏

शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

खुदगर्ज वर्षा !!

रात भर वर्षा रानी ने की है अपनी मनमानी
नाच नाच कर की है धरती को पानी पानी।
बडी मनमौजी,अलमस्त ,खुदगर्ज ये वर्षा,

जब धरती जल रही थी तो कहां थी,
माथे पे सूरज तप रहा था तो कहां थी
मन करे तो क्रूर बने , मन करे तो हर्षा।
बड़ी मनमौजी ,खुदगर्ज ये वर्षा।।

धरती के तपन को बुझाने चली हो
या करने अपनी मनमानी चली हो,
जब होती है धरा को तुम्हारी चाह
लेती नहीं तुम इसकी कोई थाह।
अब उछल उछल कर इसे सताने चली हो,
इसके तपन को और बढ़ाने चली हो।।

भू बेचारी नादान ,
बस तुम्हारे आने से
आ जाती है उसमें जान
धरती तो धरती है
प्यार से जो आये
करती है सर्वस्व उसे दान।
खोल बाँहे, समेट लेती है
करने को अपने अंगों का पान।।
भले तुम डूबा दो इसे
मचा दो त्राहि माम।

बरखा तेरे आने भर से होता
मन मुदित,हर्षित,
सर्वत्र उमंग भर जाता है,
दिल होता है बाग-बाग,
कलियांं पुष्पित हो जाते हैं।
नाच उठते पेड़ पौधे,
हवाएं गाती मल्हार।
जीव जंतु लेते अठखेलियां,
पंछी चहकने लग जाते हैं।।
तपते, तड़पते दिल को
कुछ तो ठंडक दे जाते हैं

पर ये सब कुछ दिनों की बात
फिर......तपने को छोड़ जाओगी।
नाचते गाते निकल जाएगी ये बरसात
तड़पाओगी, जलाओगी, बिताओगी अर्सा
बड़ी मनमौजी,मदमस्त खुदगर्ज ये वर्षा।।
पूनम⚡


मंगलवार, 19 जुलाई 2022

शिव-शक्ति!!

बरसने से तुम्हारे,
धरती ही गीली नहीं होती,
गीला होता है कितनों का मन!
जो चाह कर भी बरस ना पाते।

ना बरसने वाले बादल की गर्मी,
तो करते हैं सब महसूस।
पर उन आद्र नयनों का क्या ,
किसने महसूस किया है,
उस दर्द को।।

बरस कर, खुश मन की,
खुशी को बढाने वाले ,
दर्द से भरे दिल की ,
तड़प औऱ ही बढ़ा देते हो तुम।

प्रकृति,! सौम्य और दयालु,
समृद्धि और सफलता,
प्रदान करने वाली,
सभी नुकसानों से बचाने वाली ।

पर सीमा है एक सहने की,
फटना तो लाजिमी  है ना।
हे पुरुष, अब बस भी करो
नहीं  है शक्ति अब और सहने की।
कितना बर्दाश्त  करेगी ये प्रकृति,

हाँ  पुरुष.....

कहीं अति की वर्षा,
कहीं अति की धूप ,
प्रकृति  को और ना रुलाया करो,
फटेगी वो तो सारा जहाँ रोएगा।
सम्भाल लो खुद को ....इससे  पहले कि ,
शक्ति का तांडव शुरू हो जाए, 
औऱ शिव को  आना पड़े।। ॐ। ।🙏

पूनम 😐

बुधवार, 22 जून 2022

काक - पिक !!


 

कोयल  की मधुर  तान सुनने के लिए कौए को बचाना होगा!
सुन कर लगा ना कुछ अटपटा सा,.......कहाँ कर्कश कौए और मधुर  सुरीली गाने वाली कोयल। कोयल की धुर तान  सुनने  को तो सब आतुर  रहते हैं। पर कौए बेचारे को हम देखते  ही कांग भरने लगते हैँ। पर जो दिखता  है ,और हम जो सुनते हैं, वो सदैव सत्य  नहीं होता  है।
बहुतों  को पता भी नहीं  होगा की  कोयल  अपने प्रजनन  के लिए यानी  अंडे देने के लिए हमेशा कौए  पर निर्भर  करती है।

रोचक हिस्सा यह है कि कौए व कोयल का प्रजनन काल एक ही होता है। इधर कौए घोंसला बनाने के लिए सूखे तिनके वगैरह एकत्र करने लगते हैं और नर व मादा का मिलन होता है और उधर नर कोयल की कुहू-कुहू सुनाई देने लगती है। नर कोयल अपने प्रतिद्वंद्वियों को चेताने व मादा को लुभाने के लिए तान छेड़ता है। घोंसला बनाने की जद्दोजहद से कोयल दूर रहता है।

कोयल कौए के घोंसले में अंडे देती है। कोयल के अंडों-बच्चों की परवरिश कौए द्वारा होना जैव विकास के क्रम का नतीजा है। कोयल ने कौए के साथ ऐसी जुगलबंदी बिठाई है कि जब कौए का अंडे देने का वक्त आता है तब वह भी देती है। कौआ जिसे चतुर माना जाता है, वह कोयल के अंडों को सेता है और उन अंडों से निकले चूज़ों की परवरिश भी करता है।

अपने जितने अंडे वो उस घोसले में रखती है कौवे के उतने ही अंडों को खाकर या नीचे गिराकर नष्ट कर देती है जिससे कि कौवे को शक न हो। कोयल अपने अंडे रोक पाने में सक्षम होती है और इस तरह वह कौवों के एक से अधिक घोसलों में अंडे देती है।

तो  बात आई अब समझ में कि परजीवी  कोयल की तान सुनने के लिए कर्कश कौए को संरक्षित  करना क्यूँ बहुत आवश्यक है। । प्रत्येक  जीव  की अपनी  अहमियत  है।

रहीम  तो  सही कहते हैं. ....

दौनो रहिमन एक से, जौ लौ बोलत नाही|
जान परत है काक पिक, ऋतु बसत के माहि|

पर ये भी सही है. ....

किराये के संगीत पर,
कोवे की कांव कांव भी मधुर हो जाती  है। ।

सोमवार, 6 जून 2022

तमन्ना ए दिल

 

ख्वाहिशें ना होतीं.....
जो दिखाये होते 
तुमने, हर एक हसीन ख्वाब ।।

लालसा ना होती....
जो पूरे ना करते 
तुम, मेरी हएक अरमान। ।

हसरतें ना पालते.....
जो थामा ना होता, 
हर पग पर,   तेरी बाहों ने।।

दर्दे दिल ना तड़पता,.....
जो किया ना होता 
तुमने, कभी मुझसे अनुराग। ।

इश्क ए दास्ताँ की ये हश्र ना होती.....
जो वादा ना किया होता,
तुमने, साथ चलने का क़यामत तक ।।

ब तमन्ना इतनी सी है होती,......
हर पल, हर जगह ,
जब आ आख़िरी साँस,
प्रभु, सिर्फ तुम्हें देखूँ,
सिर्फ तुम्हें देखूँ।








गुरुवार, 2 जून 2022

वक़्त

 वक़्त वक़्त की बात है ……

एक मौलवी साहब थे ।

एक दिन मुर्ग़ा बेचने वाला आया ,मौलवी साहब के पोते ने कहा दादा दादा मुर्ग़ा ले दो ।दादा ने पूछा क्या भाव, मुर्ग़े वाले ने कहा, टके सेर बाबा।दादा की अण्टी में उस वक़्त एक टका ही था ।। दादा ने तुरंत कहा ,तौबा मियाँ , तौबा ये तो बहुत महँगा है ।

कुछ महीनों  के बाद फिर मुर्ग़े वाले को देख पोता मचला । मुर्ग़े वाले ने कहा,५ रुपए सेर…..। पोते  ने सोचा आज तो बिल्कुल ही नहीं ख़रीदेगा दादा।लेकिन,दादा तो ख़ुश हो कर बोला अरे ले लो ,ले लो बड़ा सस्ता दे रहा है…. पोता आश्चर्य से दादा को देखता है । दादा पैसे देने लगा… आज दादा की अंटी में १० रुपए हैं…….।।

बुधवार, 1 जून 2022

आदत !!

 बचपन मे एक कहानी सुनी थी......

दो चिड़िया थे। 

एक को पिंजरे मे रहने की आदत थी और दूसरे को उन्मुक्त आकाश में कुलांचे भरने की।  दोनों मे प्यार हो गया। बहुत प्यार करते थे  दोनों एक दूसरे से। उन्मुक्त गगन में विचरने  वाले को पिंजरा कतई रास ना आता और पिंजरे में रहने वाली ने तो अब अपना घर बसा ही लिया था.......

     ना उसने आकाश छोड़े, ना उसने  पिंजरा......😑

 

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2022

स्व!!

हीं बनना अहिल्या जैसी सती सावित्री,
कूट-योजना की भागी भी मैं,
और शापित भी मैं.....
चरणों के धूल खाने को ,
शीला खंड बन रहूँ भी मैं....

क्यूं मैं ,अपनी शक्ति दे कर,
किसी को इंद्र बनाऊँ,
सहस्त्रो रानियों के बीच बन पटरानी
ना बनना मुझे इंद्राणी

वन वन भटक, ति कीधर्मीनी हो कर भी,
अरमान नहीं, देने की अग्नि परीक्षा.....
संगिनी सिया से ज्यादा,
रजक की बातों का विश्वास,
बन कर राम की सीता,
नहीं काटना मुझे वनवास,

द्रौपदी बनने की कभी चाह नहीं,
पाँच पाण्डवरिणी ...पर!
चीर हरण ...... हुआ एक बार,
जिसके रक्षक कृष्ण हुए,
पर मन का हरण ......हुआ बार बार ,
उसका रक्षक कौन बना. ...

सर्वगुणी रावण की मंदोदरी कभी ना बनूँ,
नहीं चाहिए सोने की लंका,
पर स्त्री पर कुदृष्टि,
लंका पर कराया अग्नि वृष्टि।
विनाश काले विपरित बुद्धी,
हरि के हाथों हो गईं सिद्धि

हीं चाहिए मुझे इन ली ,
पुरुषों का साथ ,
जिनके,बल के साये में,
पूर्ण सक्षम स्त्री ,सर्वदा रही कुंठित
नर अपने दोषों को ढक,
किया सिर्फ उसे महिमा मंडित

नहीं बनाओ देवी।।

मुझे रहने दो, स्व!

नहीं बनना सिर्फ धी ,माँ ,भगिनी, भार्या,

नहीं चाहिए मुझे कोई तमगा. ...

जैसी भी हूँ, जो भी हूँ 

अपने आप में संपूर्ण हूँ,

कामिनी हूं मैं!!

मुझे बस, "मैं", ही रहने दो ...... ,

बस, मैं ही रहने दो ।।


मंगलवार, 11 जनवरी 2022

विलीन !

 पयोनिधि, असंख्य पयस्वनी संग,

नित्य उल्लसित, आवेगीत होने वाले,

अपने दर्प में चूर तुम,

क्या जानो तटिनी....

कितने ठोकर खा बहती हैँ।

सरल,सरस,सलिल नीर लिए,
तट से बंध, रहने वाली सरी,
कब,क्यों,किस वेदना में...
तड़प,तडप कर दर्द सहती है।

अट्हास का गर्जन करने वाले पयोनिधि,
कब तुमने तरनी के तरंगों को जाना है।
विस्तरित कर सिर्फ अपना किनारा,
कहाँ तुमने उसके दायरे को माना है।

कर अपना सर्वस्व न्योछावर,
सरी ने खुद को विलीन किया ।
फिर भी  छलकते तरंगिनि के
दर्द को  क्या तुमने पहचाना है।

खुद ही पथ बना कर चलती,
पग पग  पर  तृप्त सभी को करती
पत्थर तट पर सर,पटक पटक
तटिया भी तो थकती है।
कर पापों को सबके साफ,
खुद मलिन रहना ही तो सरी की नियति है।

बाढ़, सूखे का दंश सहती
सारे दुख दर्दों को समेटे,
गंगा,यमुना,सरस्वती जो भी हो नदिया.....
अपने दर्द को किससे बांटे ,

जलनिधि के लिए  सिर्फ एक धार ही है वो।
न कोई मान, न मर्यादा,
नद की ना है अस्तित्व कोई....
सुख कर धूल धूसरित हो,
मिट्टी में मिल जाना ....
और सागर में समा जाना है
तट से बंधी.  . जन्म से, तटिनी को,
हो जलधि में ....विलीन जाना है..
.....विलीन हो जाना है।।
                   पूनम😑

मंगलवार, 10 अगस्त 2021

ख्वाहिश

सूरज की रोशनी तले,जीते हुए, 

चांद भी तो निरा अकेला है।

 रंगीन ख्वाबों तले सब मन अकेला है, 

शराफत के चादर तले हर इंसान नंगा है। 

 बस ख्वाहिश है ये ख़ुदा, 

तन से तो नंगा बनाया ही है तूने, 

बस मन और भावों से नंगा मत बनाना। 

हर चमकता चीज सोना नहीं होता, 

बस इतनी समझ दे दो।  

ऐसा ना हो कि दूर के सुहावने ढोल के चक्कर में, 

अपना राग भी टूट जाए। ।

     पूनम 🤗


शुक्रवार, 23 जुलाई 2021

मन औऱ मौसम

फूल खिलते तो है,
पर मुरझाए से
तितलियां उड़ती तो हैं,
सुस्त सी,
धूप भी खिलती है,
पर मंद सी
बादल भी आते हैं,
पर शुष्क से।
सावन भी आया तो है,
पर  है सिर्फ बेचैनी सी।
क्या मौसम ही ऐसा है।
या दिल में हैं दर्द सी।

            पूनम 😐

शनिवार, 17 जुलाई 2021

बात ना बनी ।।

ज आओ ना जानम

बना लें बिगड़ी बात, 

करें बातें दिल खोकर।

दिन कितने हो गए

किए, एक वो बात,

जब होता था ना कोई राज

जाओ सनम ,
कर लें बातें मन भर।

हो जाएं एकाकार 

बस यही तो कहा था मैंने
जाने  क्या हुआ  ऐसा ,


बदल दिए उसने अपने अंदाज,
बं ना  हो पाई मेरी आंख 

हमेशा हमेशा के लिये 
छोड़ दिया मेरा साथ .....नींद ने ।।

         पूनम 😐

रविवार, 16 मई 2021

खयाल

 

रिश्ता हमारा भी बेहद अनमोल था,
रखा था हमने एक दूजे का पूरा ख्याल
फर्क़ सिर्फ इतना था........
मेरे ख़यालों में सिर्फ और सिर्फ वो था ,
और उसके ख़यालों में, मैं ही ना थी।।

                                 पूनम😬

गुरुवार, 20 जून 2019

बेघर !!


चले जा रहे है....

कहाँ ?
पता नही.....
किसी ने पूछा?
घर जा रहे हो,
घर....कैसा घर,
घर क्या सिर्फ
चार दीवार होते हैं।
जहां,सिर्फ सनाटा,
खड़े चार दीवार ,
फिर भी चारों अकेले
वृहद खालीपन,
 बेटी ने कहा ,
मेरे 'घर'आ जाओ...
पति ने कहा,...
मेरे घर आ जाओ...
फिर कानों में जोरदार गूँज,
घर, मेरा घर कहां.......
 घर को चलाते,चलाते
मैं बेघर...........
नहीं है कोई घर मेरा !!
जा रही फिर क़ैद में चार दीवारों  की।।
                   पूनम🤔

सोमवार, 18 जून 2018

आपने फुरसत में आने का बहाना जो शुरू किया,

ख्वाबों ने भीे नींद का आशियाना छोड़ दिया ।।

                                           पूनम💗

शनिवार, 16 जून 2018

फादर्स डे!!


पापा, आज के पापा,
फादर्स डे मनाते पापा,
ऑफिस, मीटिंग से भाग -भाग
बच्चों का डायपर बदलते पापा।
कठिन है, पर घर बाहर
दोनों जिम्मेदारी लेना,
काम काजी दुनिया में
मम्मी के संग कदम से कदम मिला
हाँथ बटाते पापा।।
फादर्स डे मनाते पापा।।

पहले पापा के घर में आते
बच्चे सहम, सिमट जाते थे
अपने काम में लग जाते थे,
मम्मी भी शेर आएगा जैसे
पापा का डर दिखा,डराती थीं।
होते थे बाहर से कठोर ,
अंदर कोमल पापा,
भाया मम्मी बातें जानते थे पापा।

आज फूल की तरह खिला बच्चों को
उनके साथ खेलते, खाते
अकेले दम पे 'पापा'बनते पापा।
बच्चों के सुपरमैन बनते पापा।

बच्चों के पढ़ाई से खेल तक ,
गृहकार्य से प्रोजेक्ट तक ,
परीक्षा काल में जागते,
अपनी अच्छाइयों और बुराइयों से अवगत कराते,
दुनिया दारी सिखाते,
हंसते ,खिलखिलाते पापा।
फादर्स डे मनाते पापा।
हैप्पी फादर्स डे।।
पूनम♥




सोमवार, 11 जून 2018

यादें! खट्टी-मीठी।।

कहतें हैं कि जब बचपन की याद आने लगे, मतलब आप अपनी जिंदगी के संजीदे पड़ाव पर आ गए हैं।अब ये बात सच है या नहीं, ये तो नहीं मालूम मुझे। लेकिन अस्वस्थता की स्थिति में अपने वातानुकूलित कक्ष में पड़े हुए मुझे बहुत याद आ रहा है अपना बचपन ।
बार बार याद आती है,वो बचपन की बातें।
गाँव की वो चौखट,
जहाँ बैठी होतीं थी घर की बड़ी बूढ़ी
और आते जाते किसी राहगीर से उसका हालचाल जरूर पूछतीं, किस गाँव के हो,भैया ,बाबू.........जो भी संबोधन होता ,जरूर करतीं.....थोड़ा पानी तो पी लो।
और वो राहगीर भी ,भले ही वो फेरी वाला हो या कोई और, ड्योढ़ी के बाहर ही  थोडे बाएं हट के बने कुएं के मेड पे जरूर बैठता। और कैसी हैं मालकिन , कह कर कुछ बात चीत शुरू हो जाती।हम बच्चों को घर के अंदर से कुछ चना चबेना  उस के लिए लाने के लिए कहा जाता।
   बहुत छोटी थी तो मैंने ऐसा अपनी दादी को करते देखा था। बड़ा मजा आता था हमें।जब घर के भीतर जाती कुछ मांगने उस राहगीर के लिए तो, माँ या चाची जो व्यस्त होतीं घर के काम काज में,थोड़ा कुनमुना भी जातीं। 'बूढ़ी' को तो कोई काम नहीं है,दिन भर ड्योढ़ी पर बैठ हुकुम चलाते रहती हैं।लेकिन हमें क्या फर्क पड़ता था,हम तो अपने खेलने के लिए परेशान रहते थे और जल्दी दो ना कुछ कह के चिल्लाते।।।कभी कभी इन सब के चक्कर में, हम डांट भी खा लेते,लेकिन परवाह किसे थी।
बाहर दादी उस राहगीर से अपनी बीमारी से लेकर फसल कैसी हुई और बहुएं कैसी हैं सारी बातें बतिया लेतीं।कभी कभी तो आस पास के गाँव से शादी ब्याह भी पक्का हो जाता।।।
आज सोचती हूँ मैं कि अब संभव है ऐसा क्या?अब तो दरवाजे पर आये किसी अनजान इंसान से डर लगता है।भले ही इस चक्कर में हम जरूरत मंद को भी नहीं पूछते।
     उस समय तो हम छुट्टियों में गाँव जाते थे,गर्मी की छुट्टियां गाँव में ही बीतती थी।
और तब हमें ऐसी गर्मी भी तो नहीं लगती थी।पूरी दोपहरी लाख डांट सुनने के बाद भी हम सब बच्चे, आम के टिकोरे चुनने निकल जाते थे।क्या मजेदार दिन थे !!

आज वातानुकूलित कमरे में लैपटॉप, मोबाइल में बैठे बच्चों के लिए ये सब सिर्फ कहानी मात्र है।।और समझे भी कैसे वो,इसमें भी तो हमारी ही गलती है।

घर के आम कामकाज से थकी ,सोती हुई माँ-चाची से छूप कर हम सब बच्चे भरी दोपहरी में छत के उस कोने में अड्डा जमाते थे,जहां से पीपल का पेड़ लगा हुआ था।और क्या ठंडक होती थी ! उस पीपल के पतों के हवा में......वो आज तक कहीं ना मिला हमे। हम शहर में रहने वाले भाई बहन,उन गाँव के बच्चों के पीछे लगे रहते थे। हम उन्हें ज्यादा होशियार समझते थे क्यों कि वो हमें पीपल के पेड़ के भूत से लेकर गाँव के पोखर में रहने वाले मंडूक( भूत) की ढेर कहानियां सुनाते रहते थे,और उसके ऐवज में बड़ी मुश्किल से चुने हुए हमारे आम पर हाथ साफ करते रहते थे।ये हमें अब समझ मे आता है....., हाहा।।
धीरे धीरे हम भी बड़े हो गए। दादी भी नहीं रहीं।।अब कुछ अलग मौकों पर भी गावँ जाना होता रहा जैसे, बाबा ,दादी के श्राद्ध वगैरह और शादी ब्याह के उन मौकों ने हमें थोड़ा और बड़ा कर दिया।मां ,चाची के व्यवहार में भी हमें बदलाव दिखने लगा।कल तक दादी के कहे जिन कामों से कभी चिढ़तीं थीं वो,आज वही काम करते दिखती थीं वो हमें।फिर भी उस समय हमें इतनी समझ कहाँ थी।

समय बीतता गया ,समय के साथ हम भी व्यस्त होते गए।स्कूल की बडी कक्षा के बाद कॉलेज के हॉस्टल प्रवास में व्यस्त हो गए हम भी ।गाँव जाना उतना क्रमिक ना रहा। जाते थे पर काफी कम समय के लिए। उस के बाद शादी भी हो गई तब तो और भी कम हो गया।ससुराल, पढ़ाई और मम्मी के पास जाने से कभी समय ही न मिल पाता ।लेकिन चाचा चाची से समय समय पर मिलना यत्र तत्र हो जाता था।

जीवन की व्यस्तता ने हमें और बड़ा कर दिया था।इसी बीच एक बार मौका मिला फिर गाँव जाने का।चाचा के बेटे को पुत्री रत्न की प्राप्ति हुई थी।मुझे बड़े अरमानों के साथ बुलाया गया।इन सब में मैं ये बताना कैसे भूल सकती हूँ कि मेरे चाचा चाची के तीन पुत्रियों के साथ एक पुत्र था, हम सब साथ में ही पापा के पास शहर में रह कर पढ़ते थे,जो की उन दीनों मे आम बात थी।चाचा चाची गाँव में रहते थे। सबसे खास बात ये कि मुझसे चाचा और चाची दोनों का बहुत हीं लगाव था और ढेर लाड़ मिलता था मुझे । दोनों हीं मुझसे अक्सर अपने दिल की बात किया करते थे ,पता नहीं क्यों।

हां तो मैं कह रही थी कि गाँव से चाचा से मिले मुझे खास निमंत्रण में जाने के लिए मैं भी बहुत उत्साहित थी और गई भी। बड़ा मजा आ रहा था,अपने बचपन के दिनों का पुनरावृत्ति तलाश रही थी मैं पर जो शायद संभव नहीं था।
उन्हीं चार दिनों के गाँव प्रवास की एक दोपहरी में जब मैं बाहर निकली तो वही ड्योढ़ी.....पर वहां दादी की जगह चाची
बैठी थीं ,ऐसा लगा जैसे समय दुहरा रहा रहा था अपने आप को।बड़ा अच्छा लगा मुझे,मैं भी बैठ गई वंही चाची के पास।लौट आया मेरा बचपन, लेकिन अब बहुत कुछ समझने लगी थी मैं।शब्द वही थे बिल्कुल जो दादी के हुआ करते थे,लेकिन पात्र बदल गये थे।दादी की बहू की बातों के जगह अब चाची की बहू की बातें थीं।।

समय ने एक पीढ़ी करवट ले ली थी।
सबसे दुखद तो मेरे लिए ये रहा कि चाची से मेरी वो आखिरी मुलाकात रही।उसके बाद रह गई सिर्फ उस ड्योढ़ी की यादें,सिर्फ खट्टी मीठी यादें।।
. पूनम😊

शुक्रवार, 11 मई 2018

दर्दे दिल....

वादा किया, कभी रुख़सत न होंगे
अनजाने राह पे दर्दे दिल बयां हुई।।

हाले दिल नहीं सबका एक सा,
हमारी दिले बयान सरेआम हुईं।।

ख्वाब देखना भी एक शगल था
अरमाने कत्ल भी अब आम हुईं।।

व्यवहार हर का होता नहीं एक
पर परख कर बातें तमाम हुईं।।

इजहार की गुलाब गईं मुरझा
प्यार से वफ़ा काफ़ूर हुईं।।

इंतजार किया उसे पाने की,
हर कोशिशें नाकाम हुईं।।

नयन थीं सब एक सी
पर अंदाजे नजर तमाम हुईं।।

बेबाक सी है हर एक तमन्ना
गुस्ताखियों में दिल बदनाम हुईं।।

इंतजार,इजहार,गुलाब,ख्वाब,वफ़ा,नशा
उसे पाने की कोशिशें तमाम हुईं सरेआम हुईं।

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

डर...मन का !!

जब  ही धरा पे
आई तनया..
पराई है,पराई !
पराये घर जाएगी,
इस डर के साथ
सब ने ढोल बजाई।

जाने लगी जब स्कूल,
निकल घर से,
दूर रहना परायों से,
मन में बसाया ये डर।
थोड़ी और बड़े होने पे,
कायदे सिखाते हर बात पे।
दिया जाता ये डर,
जाना है दूसरे घर।
सीख ये दी जाती हर पल,
एक भी गलत कदम पे
कुल के नाक कट जाने का डर।
गलत कदम हो किसी और का,
फिर भी जिंदगी भर तंश झेलने का डर।

अब हुआ ब्याह..
दिल था अरमानों से भरा....पर!
पराये घर से आई है....
सुन, मन ही मन गई डर।
ससुराल वालों की सेवा में,
रह ना जाये कोई कोताही
हर वक्त बना रहता ये डर।
कभी पति का डर,
कभी तानों का डर,
एक दूर होता नहीं ,
की आ जाता दूसरा डर।

अब बच्चों के लालन पालन का डर,
उनके शिक्षा और विकास का डर
बढ़ती उम्र में उन्हें
बुराइयों से दूर रखने का डर।
फिर नीड  हुआ खाली,
उड़ गए पंछी बनाने को नए घोंसले
चलो अब तो अपने आंसू पोंछ लें।
पर!अब कटेंगे दिन कैसे
इस बात का डर।।

अभी कहाँ खत्म हुई कहानी
बढ़ते उम्र की शुरू हुई कई परेशानी...
चाह होती कुछ कहने की
फिर  भी रखो मुँह बंद,
नहीं तो बच्चों का डर।
डर, डर, डर....
डर बनाम स्त्री का जीवन,
कभी ना होगा,...क्या?
इसका निराकरण!

पर...मर मर कर जीना
अब मंजूर नहीं,
अपनी कमी को
ना बनाओ अपना डर,
हौसला दिखाओ
और डर को डराओ।
डर को  खुद की
हिम्मत बनाओ।।

डर से ना तुम डरना
निर्भीक हो के बढ़ना
सुनना जरूर सबकी
करना अपने मन की
डर कंहीं और नहीं,
है तुम्हारे अंदर।
मन का डर भगाना
डर से ना तुम डरना।।
                  पूनम😯

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

नहीं मैं कोई कवयित्री!!



कवयित्रि!......नहीं ,
मै  कहाँ कवयित्री कोई।
नहीं रचती मैं कोई कविता
मैं,सिर्फ एक 'नारी' हूँ ,
जो,सिर्फ अपने भावों से भारी हूँ ।
दिल के पन्ने से उतार ,
कर देती कलम बद्ध ,
सदाशयता से हिय के बोल।।

कौन अपना ,कौन पराया
ये जग तो है सिर्फ मोह माया।
सुख-दुख में प्लवन करती,
जीवन नैया की खेवैया हूँ मैं
सपनों की गठरी हूँ मैं,
सिर्फ एक 'नारी' हूँ मैं

चित्तवृत्ति को समझना तो दूर,
ये तुमने मुझे क्या बनाया।
दिल ने दिल के अरमानों को ना समझ
कवयित्री का ये चोला क्यों पहनाया।।

नहीं!.......मैं शब्दों से खेलती भी नहीं,
ना बुनती हूँ शब्दों का कोई जाल,
मैं तो अपने अरमानों को पहनाती हूँ
बस कुछ शाब्दिक जामा,
सजाती हूँ उन्हें कल्पना के उड़ान से,
संवारती हूँ भावों की लहरों के उत्थान से।
ना ही कोई ज्ञान मुझे कवि या कविता का,
ना ही कोई अरमान.. कवयित्री बनने का।

मैं तो बस एक साधारण सी बाला
जो सब की, पर कोई नहीं उसका आला।
अपने एकाकीपन को सहलाती
कभी खिलती ,कभी कुम्हलाती
ख्वाबों को निहारती,कुछ रच जाती।
नहीं, मुझे नहीं बनना कवयित्री।

हाँ ....हास्य,रुदन,गायन
हर भावों में कर विचरण,
करती सर्व जीवन यापन
सृष्टि की सृजन कर्ता,
स्वयं में ही सर्वग्या।
सिर्फ और सिर्फ एक 'नारी'हूँ मैं,
नहीं.....नहीं कोई कवयित्री मैं ।।
पूनम😊

तट

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