सोमवार, 18 जून 2018
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उठेंगे हर बार
जब भी दिल ने चाहा, थोड़ी खुशी जी लें। धूप में खड़े होकर, थोड़ी छाँह पी लें। सोचा था कि अब तो, गम के बादल छटेंगे। खुशियों के फूल आँगन में,...
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बरसने से तुम्हारे, धरती ही गीली नहीं होती, गीला होता है कितनों का मन! जो चाह कर भी बरस ना पाते। ना बरसने वाले बादल की गर्म...
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जब भी दिल ने चाहा, थोड़ी खुशी जी लें। धूप में खड़े होकर, थोड़ी छाँह पी लें। सोचा था कि अब तो, गम के बादल छटेंगे। खुशियों के फूल आँगन में,...
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आए हैं, ना अपने मन से, न जायेंगे, अपने मन से । फिर, गम किस बात का ? जो, कुछ ना मिला अपने मन से! ढूंढोगे दूसरों की नजर से खुद को, तो दिखे...

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