बुधवार, 20 मई 2026
। बिना बुद्धि विषम विद्या।।
मंगलवार, 21 अप्रैल 2026
क्या हुआ है अपने मन से
आए हैं, ना अपने मन से,
न जायेंगे, अपने मन से ।
फिर, गम किस बात का ?
जो, कुछ ना मिला अपने मन से!
ढूंढोगे दूसरों की नजर से खुद को,
तो दिखेंगी सिर्फ बुराइयाँ।
फर्क क्या पड़ता है?
यह भी तो ना मिला अपने मन से!
आए हैं, ना अपने मन से ,
न, जायेंगे अपने मन से ।
भला, बुरा, सब तो मिला! फिर भी,
कुछ ना मिला अपने मन से !
करुं क्यों,
गिला-शिकवा कोई
जब कुछ भी ना है मिला, अपने मन से ।
आए हैं, ना अपने मन से,
न जायेंगे अपने मन से।
गुनाह नहीं
सपना देखना भी कोई ।
पर हर गुजरा दिन ,
क्यों लगने लगता है
एक सपना - सा ही!
और बिन सोचा जैसा गुजरता है क्यों?
हर अगला दिन!
आए, हैं ना अपने मन से ,
न जाएंगे, अपने मन से।
पूनम🙏
सोमवार, 18 दिसंबर 2023
तट
शनिवार, 8 अक्टूबर 2022
खुदगर्ज वर्षा !!
नाच नाच कर की है धरती को पानी पानी।
बडी मनमौजी,अलमस्त ,खुदगर्ज ये वर्षा,
जब धरती जल रही थी तो कहां थी,
माथे पे सूरज तप रहा था तो कहां थी
मन करे तो क्रूर बने , मन करे तो हर्षा।
बड़ी मनमौजी ,खुदगर्ज ये वर्षा।।
धरती के तपन को बुझाने चली हो
या करने अपनी मनमानी चली हो,
जब होती है धरा को तुम्हारी चाह
लेती नहीं तुम इसकी कोई थाह।
अब उछल उछल कर इसे सताने चली हो,
इसके तपन को और बढ़ाने चली हो।।
भू बेचारी नादान ,
बस तुम्हारे आने से
आ जाती है उसमें जान
धरती तो धरती है
प्यार से जो आये
करती है सर्वस्व उसे दान।
खोल बाँहे, समेट लेती है
करने को अपने अंगों का पान।।
भले तुम डूबा दो इसे
मचा दो त्राहि माम।
बरखा तेरे आने भर से होता
मन मुदित,हर्षित,
सर्वत्र उमंग भर जाता है,
दिल होता है बाग-बाग,
कलियांं पुष्पित हो जाते हैं।
नाच उठते पेड़ पौधे,
हवाएं गाती मल्हार।
जीव जंतु लेते अठखेलियां,
पंछी चहकने लग जाते हैं।।
तपते, तड़पते दिल को
कुछ तो ठंडक दे जाते हैं
पर ये सब कुछ दिनों की बात
फिर......तपने को छोड़ जाओगी।
नाचते गाते निकल जाएगी ये बरसात
तड़पाओगी, जलाओगी, बिताओगी अर्सा
बड़ी मनमौजी,मदमस्त खुदगर्ज ये वर्षा।।
पूनम⚡
मंगलवार, 19 जुलाई 2022
शिव-शक्ति!!
बरसने से तुम्हारे,
धरती ही गीली नहीं होती,
गीला होता है कितनों का मन!
जो चाह कर भी बरस ना पाते।
ना बरसने वाले बादल की गर्मी,
तो करते हैं सब महसूस।
पर उन आद्र नयनों का क्या ,
किसने महसूस किया है,
उस दर्द को।।
बरस कर, खुश मन की,
खुशी को बढाने वाले ,
दर्द से भरे दिल की ,
तड़प औऱ ही बढ़ा देते हो तुम।
प्रकृति,! सौम्य और दयालु,
समृद्धि और सफलता,
प्रदान करने वाली,
सभी नुकसानों से बचाने वाली ।
पर सीमा है एक सहने की,
फटना तो लाजिमी है ना।
हे पुरुष, अब बस भी करो
नहीं है शक्ति अब और सहने की।
कितना बर्दाश्त करेगी ये प्रकृति,
हाँ पुरुष.....
कहीं अति की वर्षा,
कहीं अति की धूप ,
प्रकृति को और ना रुलाया करो,
फटेगी वो तो सारा जहाँ रोएगा।
सम्भाल लो खुद को ....इससे पहले कि ,
शक्ति का तांडव शुरू हो जाए,
औऱ शिव को आना पड़े।। ॐ। ।🙏
पूनम 😐
बुधवार, 22 जून 2022
काक - पिक !!
कोयल की मधुर तान सुनने के लिए कौए को बचाना होगा!
सुन कर लगा ना कुछ अटपटा सा,.......कहाँ कर्कश कौए और मधुर सुरीली गाने वाली कोयल। कोयल की मधुर तान सुनने को तो सब आतुर रहते हैं। पर कौए बेचारे को हम देखते ही कांग भरने लगते हैँ। पर जो दिखता है ,और हम जो सुनते हैं, वो सदैव सत्य नहीं होता है।
बहुतों को पता भी नहीं होगा की कोयल अपने प्रजनन के लिए यानी अंडे देने के लिए हमेशा कौए पर निर्भर करती है।
रोचक हिस्सा यह है कि कौए व कोयल का प्रजनन काल एक ही होता है। इधर कौए घोंसला बनाने के लिए सूखे तिनके वगैरह एकत्र करने लगते हैं और नर व मादा का मिलन होता है और उधर नर कोयल की कुहू-कुहू सुनाई देने लगती है। नर कोयल अपने प्रतिद्वंद्वियों को चेताने व मादा को लुभाने के लिए तान छेड़ता है। घोंसला बनाने की जद्दोजहद से कोयल दूर रहता है।
कोयल कौए के घोंसले में अंडे देती है। कोयल के अंडों-बच्चों की परवरिश कौए द्वारा होना जैव विकास के क्रम का नतीजा है। कोयल ने कौए के साथ ऐसी जुगलबंदी बिठाई है कि जब कौए का अंडे देने का वक्त आता है तब वह भी देती है। कौआ जिसे चतुर माना जाता है, वह कोयल के अंडों को सेता है और उन अंडों से निकले चूज़ों की परवरिश भी करता है।
अपने जितने अंडे वो उस घोसले में रखती है कौवे के उतने ही अंडों को खाकर या नीचे गिराकर नष्ट कर देती है जिससे कि कौवे को शक न हो। कोयल अपने अंडे रोक पाने में सक्षम होती है और इस तरह वह कौवों के एक से अधिक घोसलों में अंडे देती है।
तो बात आई अब समझ में कि परजीवी कोयल की तान सुनने के लिए कर्कश कौए को संरक्षित करना क्यूँ बहुत आवश्यक है। । प्रत्येक जीव की अपनी अहमियत है।।
“रहीम तो सही कहते हैं. ....
दौनो रहिमन एक से, जौ लौ बोलत नाही|
जान परत है काक पिक, ऋतु बसत के माहि|
पर ये भी सही है. ....
किराये के संगीत पर,
कोवे की कांव कांव भी मधुर हो जाती है। ।
सोमवार, 6 जून 2022
तमन्ना ए दिल
ख्वाहिशें ना होतीं.....
जो दिखाये न होते
तुमने, हर एक हसीन ख्वाब ।।
लालसा ना होती....
जो पूरे ना करते
तुम, मेरी हर एक अरमान। ।
हसरतें ना पालते.....
जो थामा ना होता,
हर पग पर, तेरी बाहों ने।।
दर्दे दिल ना तड़पता,.....
जो किया ना होता
तुमने, कभी मुझसे अनुराग। ।
इश्क ए दास्ताँ की ये हश्र ना होती.....
जो वादा ना किया होता,
तुमने, साथ चलने का क़यामत तक ।।
अब तमन्ना बस इतनी सी है होती,......
हर पल, हर जगह ,
जब आए आख़िरी साँस,
प्रभु, सिर्फ तुम्हें देखूँ,
सिर्फ तुम्हें देखूँ। ।।
उठेंगे हर बार
जब भी दिल ने चाहा, थोड़ी खुशी जी लें। धूप में खड़े होकर, थोड़ी छाँह पी लें। सोचा था कि अब तो, गम के बादल छटेंगे। खुशियों के फूल आँगन में,...
-
चले जा रहे है.... कहाँ ? पता नही..... किसी ने पूछा? घर जा रहे हो, घर....कैसा घर, घर क्या सिर्फ चार दीवार होते हैं। जहां,सिर्फ सनाटा...
-
तोड़ते रहे तुम बंदिशें , और समेटती रही मैं, बारंबार ! की कोशिश जोड़ने की, कई बार ! पर गई मैं हार , हर बार ! समझ गई मैं, क्यु हूँ बेकरार ! ...
-
बरसने से तुम्हारे, धरती ही गीली नहीं होती, गीला होता है कितनों का मन! जो चाह कर भी बरस ना पाते। ना बरसने वाले बादल की गर्म...





