बुधवार, 20 मई 2026

। बिना बुद्धि विषम विद्या।।

।।बिना बुद्धि विषम विद्या।।, यूँ तो, यह कहावत बहुत पुरानी है। पर, मेरे दिमाग में बचपन से ही अंकित है क्योंकि मैं अपने दादाजी से अक्सर यह वाक्य सुना करती थी। उन दिनों तो हम इसे सिर्फ एक जुमलेबाजी के रूप में लेकर खेलते रहते थे।पर, आज के समय में यह कहावत बिल्कुल सही चरितार्थ होती दिख रही है। विद्या तो अपूर्व सबको प्राप्त है ,हर कोई विद्वान है । साक्षरता की शर्तों पर कहे या डिग्री की शर्तों पर - किसी में कोई कमी नहीं है या यूँ कहें कि अनपढ़ कोई नहीं है । पर बुद्धि सीमित होती जा रही है। हर क्षेत्र में हमेशा से बुद्धि की जरुरत आती रही है। हमारे पूर्वज ज्यादातर तो बस कहलाने को ही साक्षर थे, लेकिन उनकी विद्वत्ता और बुद्धिमता अतुल्य थी। उनके कहे शब्दों और वाणी का ही आज तक विश्लेषण होता रहता है। खास कर आज के सामाजिक परिवेश में तो यह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है, हम विद्वान होते जा रहे हैं, लेकिन बुद्धिमता में बहुत पीछे छुटे जा रहे ,,,फिर तो विद्या का विष बनना तो अनिवार्य है। ।।ईश्वर सबको सद्बुद्धि दे।। हाल में ही अपने पापा से बात करते हुए उनकी यह पंक्ति मुझे बहुत अच्छी लगी। पहले के जमाने में पढ़ाई शुरू होती थी तो शिक्षक सबसे पहली लाइन बच्चों से यह लिखवाते थे रामा गति देहु सुमति। कितन गूढ़ वाक्य है, एक छोटी - सी पंक्ति में बहुत कुछ सिमटा हुआ है '। "'राम गति देहु सुमति"।। गायत्री मंत्र का भी मूल अर्थ यही है। ईश्वर हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।"। ईश्वर से प्रार्थना है कि आज के समय में भी हम सब को सुमति मिले।। ।। राम गति देहु सुमति। 🙏🙏🥰

। बिना बुद्धि विषम विद्या।।

।।बिना बुद्धि विषम विद्या।।, यूँ तो, यह कहावत बहुत पुरानी है। पर, मेरे दिमाग में बचपन से ही अंकित है क्योंकि मैं अपने दादाजी से अक्सर यह वा...