मंगलवार, 21 अप्रैल 2026

क्या हुआ है अपने मन से


 आए हैं, ना अपने मन से,

 न जायेंगे, अपने मन से ।

फिर, गम किस बात का ?

जो, कुछ ना मिला अपने मन से!


ढूंढोगे दूसरों की नजर से खुद को,  

तो दिखेंगी सिर्फ बुराइयाँ।

फर्क क्या पड़ता है?

यह भी तो ना मिला अपने मन से!


आए हैं, ना अपने मन से ,

न, जायेंगे अपने मन से ।


भला, बुरा, सब तो मिला! फिर भी,

कुछ ना मिला अपने मन से !

करुं क्यों,

गिला-शिकवा कोई

जब कुछ भी ना है मिला, अपने मन से ।


आए हैं, ना अपने मन से,

न जायेंगे अपने मन से।


गुनाह नहीं 

सपना देखना भी कोई ।

पर हर गुजरा दिन ,

क्यों लगने लगता है

एक सपना - सा ही!

और  बिन सोचा जैसा गुजरता है क्यों?

हर अगला दिन!


आए, हैं ना अपने मन से ,

न जाएंगे, अपने मन से।

               पूनम🙏

1 टिप्पणी:

  1. नहीं रुकना है यहाँ किसी को,

    जो आया, उसे जाना है।

    ठहरने की हठी यह लिप्सा,

    मन को बस भरमाना है।

    जवाब देंहटाएं

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